स्वां नदी के किनारे शिव का वास ( शिवबाड़ी मंदिर ऊना)

स्वां नदी के किनारे शिव का वास ( शिवबाड़ी मन्दिर )

हैलो दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में गगरेट से लगभग 2 किलोमीटर दूर सोनभद्रा नदी यानी स्वां नदी के किनारे बसा द्रोण शिव मंदिर शिवबाड़ी के बारे में।

शिवबाड़ी मन्दिर

शिवबाड़ी मन्दिर

ऊना जिला में गगरेट से लगभग दो किलोमीटर दूर सोमभद्रा नदी ( स्वां नदी ) के किनारे लगभग सौ फुट की ऊंचाई पर बसा द्रोण शिव मंदिर शिवबाड़ी नाम से प्रसिद्ध है । इस मंदिर को द्रोण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है ।

ऐसा माना जाता है कि बैसाखी के दूसरे शनिवार को यहां शिव का वास होता है ।  इसलिए यहां इस समय एक मेला लगता है । ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर 5 से 6 हजार साल पुराना है । मंदिर में बहुत सारी मूर्तियां पुरानी है ।

शिवबाड़ी मन्दिर में श्रद्धालुओं की भीड़

शिवरात्रि का उत्सव यहां पुरानी रीति से होता है । रात्रि को पूजन वेद मंत्रों तथा शिवार्चन पद्धति द्वारा होता है । शिवरात्रि के दिन यहां पंजाब व हिमाचल के दूर – दूर से लोगों की भीड़ एकत्रित होती है और इस दिन दूर – दूर से आए लोगों द्वारा विशाल भंडारों का आयोजन किया जाता है । श्रद्धालु लोग स्वां नदी में स्नान करके भगवान शंकर की पूजा – अर्चना करते हैं ।

बैसाखी के दूसरे शनिवार को भगवान शिव आते हैं शिवबाड़ी

जनश्रुति के अनुसार जिस जंगल में मंदिर बना हुआ है , पहले वह नगरी गुरु द्रोणाचार्य की नगरी हुआ करती थी । वहां द्रोणाचार्य सांयकाल स्वां नदी में स्नान करके शिव की आराधना के लिए हिमालय पर जाया करते थे । द्रोणाचार्य की एक कन्या यजाति थी ।

उसने एक दिन अपने पिता से विनती की कि वह उन्हें अपने साथ हिमालय ले चलें , परंतु पिता द्रोण ने उसे साथ ले चलने की बात पर कहा कि तुम पहले घर पर बैठ कर ओम नमः शिवाय ‘ का जाप करो । इस पर यजाति घर पर ही एकाग्रचित व दृढ़ विश्वास से प्रतिदिन मंत्रोच्चारण करने लगी । वह उस समय बाल्यावस्था में ही थी । यजाति ने कुछ समय बाद अपने पिता को बताया कि एक जटाधारी बालक उनके पास आता है और कुछ समय पश्चात खेलकूद करके वापस चला जाता है ।

तब गुरु द्रोणचार्य ने सोचा कि देखूंगा कौन इसके पास आता है । दूसरे दिन जब द्रोणाचार्य हिमालय की तरफ जा रहे थे तो वह रास्ते से वापस आ गए और उन्होंने देखा कि शिव भोले स्वयं बालक का रूप धारण कर यजाति के साथ खेल रहे थे । उन्होंने उन्हें नमन किया और पूछा कि यह कैसी लीला है । शंकर ने कहा कि भोली सी कन्या ने हमें याद किया और हम आ गए । कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात यजाति ने शिव से कहा कि हम आपको नहीं जाने देंगे । पिता हर रोज आपके पास जाते हैं । आपको यहीं रहना पड़ेगा ।

यजाति के बार – बार आग्रह करने पर शिव बोले कि हमारा सभी धार्मिक व पवित्र स्थानों पर वास होता है । लेकिन तुम्हारे हठ करने पर मैं यहां इस दिन जरूर आया करूंगा और मेरा वास स्थान होगा । यहां पर पिंडी ” शिवलिंग ‘ की स्थापना शिव व द्रोणाचार्य ने अपने हाथों से की और शंकर पिंडी रूप बनाने के बाद अंतर्ध्यान हो गए , तब से यह पर्व चला आ रहा है । लोगों का मानना है कि बैसाखी के दूसरे शनिवार को भगवान शंकर यहां आते हैं । इस दिन यहां पर बहुत बड़ी भीड़ होती है ।

शिवबाड़ी मन्दिर में बनी हैं 15-20 समाधियां

इस मंदिर में 15-20 समाधियां बनी हुई हैं ।
यह उन महान साधु – संतों की समाधियां हैं , जिन्होंने शिवबाड़ी में रहकर तपस्या करके अपना जीवन सफल बनाया । द्रोण शिव मंदिर , अम्ब तथा जम्मू के शासकों का भी श्रद्धा का केंद्र बना रहा । इन राजाओं ने मंदिर के बिल्कुल नीचे कुएं खुदाए हैं ।

पांडवों का शिवबाड़ी मन्दिर से सम्बंध

पांडवों ने भी अपने वनवास के समय यहां पर काफी समय बिताया था और स्थापित किए हुए शिवलिंग की पूजा की । इस मंदिर की मुख्य बात यह है कि शिवलिंग अंदर की और धंसा हुआ है और मंदिर भी जमीन की गहराई से तीन – चार फुट अंदर की ओर है । इसके लिए विदेशी आक्रमणकारियों से संबंधित एक कथा प्रचलित है । यह मंदिर एक घने जंगल में है । इस घने जंगल की लकड़ी को कोई नहीं काटता । यह लकड़ी दाह संस्कार आदि के लिए काटी जाती है । इसके अलावा साधु – महात्मा के लिए धुना जलाने , यज्ञ व भंडार आदि के लिए मुफ्त लकड़ी ली जाती है।

शिवबाड़ी मन्दिर कैसे पहुंचा जाए

इस मंदिर तक पहुंचने के लिए ऊना से लगभग 34 किलोमीटर का सफर तय करना पढ़ता है। जो की ऊना जिले के गगरेट से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर है।

आप सभी ने आज स्वां नदी के किनारे शिव का वास ( शिवबाड़ी मन्दिर ) के बारे में पढ़ा । आपको यह Article  कैसा लगा Comment Section में जरूर बताएं ।

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